अजमेर के फ्लावर्स प्ले स्कूल में बच्चों के ओवरऑल डेवलपमेंट के लिए पढ़ाई के साथ डेली लाइफ स्किल्स, गेम्स और अलग-अलग डेवलपमेंट एक्टिविटीज पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्कूल की प्रिंसिपल ने बताया कि बच्चों का विकास केवल किताबों और पढ़ाई तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें छोटी उम्र से ही आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी काम किया जाना जरूरी है।
- बच्चों को छोटी उम्र से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
- बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष व्यवस्था
- हर क्लास रूम में फायर एक्सटिंग्विशर
- दूर से आने वाले बच्चों के लिए प्रिंसिपल की खास सलाह
- बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर स्कूल रखता है नजर
- बच्चों की इमोशनल वेलबीइंग पर भी ध्यान
- जरूरत पड़ने पर चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद
- 2 से 6 साल तक के बच्चों के लिए अलग-अलग कक्षाएं
बच्चों को छोटी उम्र से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
स्कूल की प्रिंसिपल के मुताबिक बच्चों को रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम खुद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इनमें अपना बेड बनाना, अपने छोटे काम स्वयं करना और घर के सामान्य कार्यों में माता-पिता की मदद करना शामिल है। उनका कहना है कि ऐसी गतिविधियां बच्चों में सेल्फ डिपेंडेंसी और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने में मदद करती हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चों के ओवरऑल डेवलपमेंट के लिए केवल पढ़ाना पर्याप्त नहीं है। गेम्स और स्पोर्ट्स के साथ ऐसी गतिविधियां भी जरूरी हैं, जिनसे बच्चे अपने दैनिक जीवन से जुड़ी जरूरी चीजें सीख सकें।
बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष व्यवस्था
स्कूल में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी विशेष सावधानी बरती जाती है। प्रिंसिपल ने बताया कि छुट्टी के समय बच्चे को किसी भी व्यक्ति के साथ सीधे नहीं भेजा जाता। यदि बच्चे को लेने के लिए उसके माता-पिता के बजाय कोई दूसरा व्यक्ति आता है, तो स्कूल की ओर से पहले रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर माता-पिता से संपर्क कर वेरिफिकेशन किया जाता है। पुष्टि होने के बाद ही बच्चे को उस व्यक्ति के साथ भेजा जाता है।
अनजान व्यक्ति के साथ बच्चे को नहीं भेजा जाता, पहले माता-पिता से वेरिफिकेशन किया जाता है।
फ्लावर्स द प्ले स्कूल की प्रिंसिपल
हर क्लास रूम में फायर एक्सटिंग्विशर
स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए क्लास रूम में फायर एक्सटिंग्विशर भी लगाए गए हैं। प्रिंसिपल के अनुसार स्कूल परिसर में किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों का ध्यान रखा जाता है। साथ ही बच्चों के आसपास किसी भी तरह की शार्प या पॉइंटेड चीजें नहीं रखने की सावधानी बरती जाती है।
दूर से आने वाले बच्चों के लिए प्रिंसिपल की खास सलाह
स्कूल में वैन सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद प्रिंसिपल ने छोटे बच्चों के लंबे सफर को लेकर अभिभावकों को विशेष सलाह दी। उनका कहना है कि अगर कोई बच्चा 40 मिनट स्कूल आने और 40 मिनट वापस जाने में खर्च करता है तो इतनी कम उम्र में उसके लिए लंबी यात्रा परेशानी का कारण बन सकती है।
उन्होंने अभिभावकों को सुझाव दिया कि छोटे बच्चों के लिए संभव हो तो उनके घर के आसपास ही स्कूल का चयन किया जाए। उनके अनुसार बच्चों का स्कूल उनके घर से करीब 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में हो तो बेहतर रहता है, जिससे उन्हें लंबे समय तक वैन में सफर नहीं करना पड़े।
बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर स्कूल रखता है नजर
बच्चों की फैमिली से जुड़ी परिस्थितियों का उनके व्यवहार पर असर पड़ने की बात भी प्रिंसिपल ने कही। उन्होंने बताया कि कई बार बच्चे घर की बातें स्कूल में साझा करते हैं। अगर कोई बच्चा अचानक शांत रहने लगे, दूसरों से बातचीत न करे या असहज दिखाई दे तो शिक्षक उस पर ध्यान देते हैं।
ऐसी स्थिति में प्रिंसिपल बच्चे से व्यक्तिगत रूप से बात करने के साथ-साथ उसके माता-पिता से भी संपर्क करती हैं। उन्होंने कहा कि केवल शिक्षकों के भरोसे रहने के बजाय जरूरत पड़ने पर वह खुद पहल करके अभिभावकों को स्कूल बुलाती हैं ताकि समस्या को समझा जा सके।
बच्चों की इमोशनल वेलबीइंग पर भी ध्यान
स्कूल में अलग से कोई निर्धारित काउंसलर नहीं है, लेकिन प्रिंसिपल के अनुसार हर शिक्षक बच्चों की इमोशनल वेलबीइंग पर ध्यान देता है। स्कूल में बच्चों को छोटे समूहों में रखा जाता है ताकि शिक्षक हर बच्चे के साथ बेहतर तरीके से जुड़ सकें।
प्रिंसिपल ने बताया कि आमतौर पर एक ग्रुप में करीब 20 से 22 बच्चों को रखा जाता है। इससे शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार, सीखने और भावनात्मक स्थिति पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने का अवसर मिलता है।
जरूरत पड़ने पर चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद
प्रिंसिपल ने कहा कि छोटे बच्चों को भी घर और आसपास की परिस्थितियों से तनाव या भावनात्मक परेशानी हो सकती है। यदि किसी बच्चे की समस्या स्कूल स्तर पर हल नहीं हो पाती है तो जरूरत के अनुसार चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद ली जाती है। अभिभावकों को भी विशेषज्ञ से संपर्क करने की सलाह दी जाती है।
2 से 6 साल तक के बच्चों के लिए अलग-अलग कक्षाएं
फ्लावर्स द प्ले स्कूल में बच्चों की उम्र के अनुसार अलग-अलग कक्षाएं संचालित की जाती हैं। स्कूल की जानकारी के अनुसार 2 से 3 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए प्ले ग्रुप और प्री-नर्सरी, 3 से 4 वर्ष के बच्चों के लिए नर्सरी, 4 से 5 वर्ष के बच्चों के लिए एलकेजी और 5 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए एचकेजी की व्यवस्था है।
स्कूल की ओर से बच्चों की शिक्षा के साथ उनके व्यवहार, आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और भावनात्मक विकास को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है। स्कूल प्रबंधन का मानना है कि शुरुआती उम्र में बच्चों को सही वातावरण और व्यक्तिगत ध्यान मिलने से उनके व्यक्तित्व के विकास की मजबूत नींव तैयार की जा सकती है।



